राष्ट्रीय स्वम सेवक संघ राष्ट्र भक्तों का महा कुम्भ।
राष्ट्रीय स्वम सेवक संघ राष्ट्र भक्तों का महा कुम्भ।
जितेंद्र कुमार शर्मा
वर्ष 2025 आरएसएस रूपी वट वृक्ष एक सदी का गवाह बन जायेगा।इस काल खंड में संघ चला रुका फिर दौड़ा, कभी प्रतिबंध लगा तो कभी प्रतिबंध हटे मगर राष्ट्र प्रेम की यह अविरल धारा निरन्तर बहती रही। 1925 में विजयदशमी के दिन जिस संगठन की नींव नागपुर में 12 लोगो की शाखा से पड़ी थी आज वो शाखाएं विश्व भर में व्यक्ति निर्माण में लगी हैं।यह अनुशासन निरन्तर लग्न का ही नतीजा था कि जिस रायसीना हिल्स से कभी संघ पर प्रतिबंध लगे थे आज उस रायसीना पर उसी संघ के स्वम सेवक का कब्जा है।
आप अंदाज लगा सकते हैं कि डॉ बलिराम हेडगेवार जी ने कॉंग्रेस में रहते हुए जिस संगठन की परिकल्पना की थी उस संगठन से देश भर से हजारों युवा जुड़े और पूर्णकालिक रहने का प्रण लिया।बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एमएससी के छात्र ने एक ऐश्वर्यपूर्ण जीवन छोड़ा और देश भर में संघ का विस्तार कर दिया, जिन्हें सभी स्वम सेवक आदरभाव से गुरु जी बुलाते हैं। आज लाखो कार्यकर्ता ऐसे हैं जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का प्रण लिया है। जिस उम्र में युवा मन मे यौवन अंगड़ाई मारता है उस उम्र में युवा आजीवन अविवाहित रहने का प्रण लेता है, साईकिल से संगठन विस्तार का कार्य करता है।अपना घर त्याग कर स्वम सेवको के घर रहता है।कभी कहीं कभी कहीं भोजन और रात्रि विश्राम करता है।घर के सभी साधन आनन्द त्याग कर एक तपस्या की ओर निकल पड़ता है तब कहीं जाकर वो कुंदन बन पाता है।आज करोड़ो लोग शाखाओं के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा लेते हैं। एक ऐसी प्रेरणा चाहें भूकम्प हो,बाढ़ हो या अन्य कोई दुर्घटना स्वम सेवक कूद पड़ता है।
संघ कभी अपने स्वम सेवक को नही भुलता।
यह संघ की ही प्रेरणा है जब एक सत्रह वर्षीय नव दम्पत्ति राष्ट्र निर्माण में लगने का निर्णय लेता है एक पूर्णकालिक स्वम सेवक बन जाता है और पत्नी शिक्षिका बन कर राष्ट्र निर्माण में लग जाती है। संगठन उसकी प्रतिभा के अनुसार उसे राजनीति में भेजता है, बाद में वही युवक पहले सूबे का मुख्यमंत्री बनता है और बाद में देश का प्रधानमंत्री ,मगर दोनों संसार मे रहते हुए एक सन्यासी से जीवन बिताते हैं।कभी एक दूसरे से कोई शिकायत नही।एक सब्जी वाले स्वम सेवक को संघ राजनीति में भेजता है, तपता है जब सूबे में पहली बार सरकार बनती है तो उसे मुख्यमंत्री बना दिया जाता है।
संघ जीवन मे त्याग किस कदर भर देता है इसका परिचायक यह है कि आज के समय मे व्यक्ति सत्ता पद में इतना पागल हो जाता है कि राजनीति क्या करा दे कुछ नही पता।मगर दूसरी तरफ एक उदाहरण देखिये कि संघ जब स्वम सेवक को राजनीति में भेजता है तो वह महामंत्री संगठन बनता है यानी भाजपा में संगठन सत्ता का केंद्र।सारी धुरी जिसके चारों ओर घूमती है,मगर जब संघ वापस उसे संघ या अनुसांगिक संगठन में वापस बुलाता है तो वह सब चकाचोंध छोड़ कर वापस उसी सन्यासी जीवन मे चला जाता है मगर राष्ट्र निर्माण की धारा अविरल बहती रहती है।इतिहास में कहीं कोई साक्ष्य नही कि किसी संगठन महामंत्री ने कभी इस प्रक्रिया का विरोध किया हो।सदैव किंग मेकर की भूमिका में रहने वाला संघ कभी किंग नही बनना चाहता।
मंच माला और माइक से सदैव दूर रहने वाला स्वम सेवक सदैव राष्ट्र निर्माण के चिंतन में लगा रहता है।
बस एक ईष्ट एक ही आराधना " माँ भारती"
सही से समझाया सर जी आपने🙏
ReplyDeleteधन्यवाद सर
Deleteप्रणाम भाई साहब
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